By – Adhunik Kalidas

जिम्मेदार इश्

दोस्तों। यकिनन हर किसी को जीवन के किसी न किसी मुकाम पर प्यार ज़रूर होता  है ,जरूरी तो नहीं की ये बस एक बार ही हो पर हां पहली बार जो प्यार होता है उस प्यार से हमारे दिल और दिमाग दोनों को बहुत प्यार होता है पर हां साथ ही यह भी सच है कि बहुत कम लोगों का पहला प्यार ही उनके पूरे जीवन तक उनकेे जीवनसाथी के तौर पर साथ रहता है अधिकतर लोगों का पहला प्यार किसी न किसी कारण से छूट ही जाता है और ऐसे ही कारणों की चर्चा करेंगे हम आपसे 

जी हां अब हर सप्ताह हम आपके लिए लेकर आएंगे पहले प्यार की एक सच्ची कहानी और वो कारण जिनसे वो कहानी कभी पूरी हो सकीं , तो दोस्तों अगर आप भी चाहतें हैं कि हम आपकी उस पहले प्यार वाली अधुरी कहानी को हमारे फिल्मी शब्दों में दुनिया के सामने रखे तो हमें आपकी कहानी मेल के माध्यम से भेजें

तो चलिए अब ज्यादा देर करते हुए शुरू करते हैं हमारी पहली कहानी जो कि 35 वर्षीय युवक धीरज की है धीरज वर्तमान में जयपुर जिले के निकट सरकारी अध्यापक है जो बहुत समय बाद अपने पुश्तैनी गांव जा रहे हैं

आगे की कहानी धीरज के शब्दों में……..

आधे फरवरी तक हवस वाला इश्क खत्म हो चुका था और बसंत पंचमी से प्रकृति का निर्मल प्रेम शुरू हो गया था खैर मैं बिल्कुल सही समय पर स्टेशन तक पहुंच गया था और गनीमत ही मानिये की मेरी ट्रेन भी बिल्कुल सही समय पर थी मैं भागकर ट्रेन में चढ़ गया और खिड़की वाली सीट पकड़ ली ,अब बस इंतजार था तो ट्रेन के चलने का हालांकि ट्रेन के चलने में अभी थोड़ा समय था पर फिर भी दिल में एक ख्वाहिश थी अब बस जितनी जल्दी हो मैं अपने शहर पहुंच जाऊं अपने अलवर में ,हां मेरा अलवर माना ज़िन्दगी का एक बहुत छोटा हिस्सा ही गुजारा था मैंने वहांं, शुरु से जयपुर में ही रहा ,कभी कभी ही जाना हो पाता था वहां घर पर ,लेकिन जितनी बार भी गया वहां ,हमेशा वहा से कुछ खुशियां समेट लाता था और मैं बस अपने शहर के ख्यालों में खोने ही वाला था कि ट्रेन ने सीटी दी और मैं चल पड़ा उसी राह पर जिस राह में कभी बस ठहर जाना चाहता था उम्र भर के लिए ,आज पूरे दस सालों के बाद अपने अलवर जा रहा था हां पूरे दस साल बाद और इन्हीं दस साल पहले शुरू हुई थी मेरे पहले प्यार की अधुरी कहानी 

खैर अपनी कहानी शुरू करने से पहले आप लोगों को कुछ अपने बारे में भी बता देता हूं तो दोस्तों मेरा नाम तो आप लोग जानते ही होंगे धीरज। मैं बहुत छोटा था करीब सात साल का की तभी पिताजी का निधन हो गया बस घर में बचे मैं ,मेरी मां और मेरा बड़ा भाई जो शायद उम्र में तो मुझसे बस चार साल बड़ा था पर जिम्मेदारी में ये फासला और भी ज्यादा हो जाता है पिताजी के निधन के बाद मैं अपने मामाजी के साथ जयपुर गया या फिर यूं कहना सही होगा कि वो मुझे अपने साथ जयपुर ले आये मुझे आज भी याद है मैं बहुत रोया था उस समय पहले पिताजी और अब मां से दूर होने की पीड़ा और इन सब घटनाओं ने शायद मेरे बचपन को बाकी बच्चों के बचपन से इतर एक जिम्मेदार बचपन बना दिया था , हालांकि मामाजी और उनके परिवार में मुझे कभी भी दुःख महसूस नहीं हुआ , उन्होंने हमेशा मुझे अपने बच्चों के जैसे पाला बस कुछ था तो यह कि मामाजी बहुत सिद्धांतवादी थे और इसलिए मैं हमेशा उनसे डरकर रहता था और शायद ये भी एक कारण था कि मैंने हमेशा अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगाके रखा,कभीकभी मैं मां और भाई से मिलने घर जाता था मैं भले ही अपने भाई से दूर रहा था पर हां वो हमेशा मेरे दिल के पास ही रहा और हो भी क्यूं क्योंकि जो दुःख उसने सहा वो मेरे दुःख से बहुत ज्यादा था वो ज्यादा पढ नहीं सका या ये कहना ज्यादा सही होगा कि जिम्मेदारीयो के बोझ ने कभी उसे पढ़ने नहीं दिया पर वो एक आंख से देख नहीं पाता था हां दिव्यांग था तो इसलिए कम पढ़ने के बाद भी शिक्षा विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में उसकी नौकरी लग गई 

लगता है परिचय थोड़ा लम्बा हो गया तो चलिए शुरू करते हैं मेरी कहानी,मेरे पहले प्यार की अधुरी कहानी

ये कहानी दस साल पहले शुरू हुई थी मैं जयपुर से अपने घर मां और भाई से मिलने जा रहा था ,मैं स्टेशन पर थोड़ा लेट पहुंचा तो भागते हुए ट्रेन पकड़ी हालांकि ठंड का समय था उपर से रात वाली ट्रेन तो भीड़ कम थी और मुझे मेरी पसंदीदा खिड़की वाली सीट मिल ही गयी मैं जल्दी से जाकर वहां बैठ गया मैं अपनी सांसे संभाल ही रहा था कि एक तीखी आवाज और हां प्यारी भी मेरे कानों में गूंजी, किसी लड़की की आवाज़ थी हालांकि मैंने नज़र अंदाज़ कर दिया क्योंकि मुझे लगा वो किसी और से बोल रही है तो वो एक बार फिर तेज से बोलीसुनियेऔर हां इस बार पक्का था कि वो मुझसे ही बोल रही थी तो मैंने उसकी और देखा और वो जो दृश्य था वो आज भी मेरी जिंदगी के सबसे हसीन पलों से भी ज्यादा हसीन था एक ऐसा पल जहां में सब कुछ भुलाकर कहीं खो गया था और शायद आज भी खुद को वहीं कहीं उस पल में खोया हुआ पाता हूं मैं उसे एकटक देखता रहा चेहरा मासुम था पर आवाज बहुत तीखी थी ,साधारण रंग रुप और नशीली आंखें यूं तो वो चेहरा एक साधारण लड़की जैसा ही था पर उस चेहरे में एक अलग सा आकर्षण था कि मैंने एक नजर देखा और देखता ही रह गया लेकिन तभी वो गुस्से में थोड़ा तेज से बोलीहैलो मिस्टर ये मेरी सीट है ,मै यहां पहले बैठी थी देखा नहीं मैंने अपना रुमाल यही रखा थातभी मैंने थोड़ा उठकर देखा तो हां मैं गलती से जल्दबाजी में उसके रूमाल को अनदेखा कर वहां बैठ गया था बस फिर क्या था मैंने उसे सोरी कहा और थोड़ा साइड होकर बैठ गया और वो गुस्से से कुछ बड़बड़ाती हुई वहां बैठ गयी , मुझे बचपन से खिड़की वाली सीट बहुत पसंद थी इतनी की कई बार तो मेरी नोंकझोंक भी हो चुकी थी पर फिर भी मैंने कभी अपनी खिड़की वाली सीट नहीं छोड़ी पर आज पता नहीं क्या हुआ की मै चुपचाप बिना किसी कहासुनी के चुपचाप साईड हो गया खैर ट्रेन चल दी पर मैं कहीं रूक सा गया था मैं बस एक नजर उसे देखा जा रहा था वैसे तो मैं शुरू से लड़कियों से बिल्कुल दूर रहा हूं एकदम सख्त लोंडा टाईप पर आज पता नहीं क्या हुआ कि मैं बस उससे बातें करना चाहता था कि तभी उसने मेरी ओर देखा और कुछ कहने के लिए अपने होंठ खोले और बस तभी मेरा दिल शायद ज़िन्दगी में पहली बार इतना तेज धडका था कि उसने मुझे घुरकर देखा और फिर गुस्से में कुछ बड़बड़ाने लगी शायद उसे मेरा इस तरह देखना अच्छा नहीं लगा तो मैंने भी खुदपर थोड़ा नियंत्रण किया और सीधा होकर बैठ गया थोड़ा समय बीता और ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकीं तो मैंने एक बार चुपके से उसकी तरफ देखा और खड़ा होकर अपने बैग में से पानी की बोतल निकाली और पानी पीने लगा ,पानी पीते हुए मैं बस यही सोच रहा था कि इससे भी पानी के लिए जरूर पूछूंगा पर मैं पानी पीकर जैसे ही उससे पूछने की हिम्मत जुटा पाता उससे पहले ही उसने मुझसे पानी की बोतल मांगी और मैंने बिना कुछ कहे चुपचाप उसे वो बोतल देदी वो ढक्कन खोल पानी पीने लगी और मैं पानी पीते हुए एकटक निहारने लगा आखिर किसने सोचा था यार की बोतल के पानी पर शुरू हुआ किस्सा एक दिन आंखों के पानी पर जा खत्म होगा खैरररर उसने पानी पीया और थैंक्स बोलते हुए बोतल मुझे दी एकपल को बोतल ले मैं कुछ सोचने लगा कि बात आगे बढाऊ या नहीं पर इतने अच्छे मौके को मैं हाथ से नहीं जाने देना चाहता था तो मैंने भी उसे लगे हाथ सोरी बोला दिया ( थैंक्स के बदलें नहीं बल्कि उसे अजीब तरह से घूरने के बदले ) और इस तरह हमारी बात शुरू हुई तब मुझे पता लगा कि उसने भी मेरी तरह वाणिज्य में स्नातक की डिग्री हासिल की है और वो अभी जयपुर से अपनी परिक्षा देकर रही थी और सबसे अच्छी बात यह थी वो अलवर की ही रहने वाली थी और उससे भी अच्छा यह कि उसका घर जिस मोहल्ले में था वो मोहल्ला मैरे मोहल्ले के बिल्कुल पास था और दोनों मोहल्लों के बीच एक पार्क भी था तो बातों ही बातों में मैंने उससे यह भी जान लिया कि वो रोज सुबह उस पार्क में मार्निंग वाक पर जाती थीं उससे बात करते हुए समय का कुछ पता ही नहीं चला वरना पैसेंजर ट्रेन में जो हमेशा लेट ही रहती थी पर आज पहली बार लगा कि ट्रेन अपने निर्धारित समय से पहले स्टेशन पर गई रात थोड़ी ज्यादा हो गयी थी उसे उसके पापा लेने आये थे यूं तो उससे दूर होना थोड़ा मुश्किल था पर शायद अब दोबारा मिलने की एक उम्मीद भी थी और एक शुरुआत भी हो चुकी थी दोस्ती की जो खुद एक शुरुआत थी मेरे अधूरे पहले प्यार की या फिर मेरी जिम्मेदारी वाले प्यार की

मैं लगभग पौने नौ बजे तक अपने घर पहुंच गया था ,अंधेरा थोड़ा ज्यादा ही हो गया था तो सड़क भी काफी सुनसान ही थी , सर्दियों का ना यार ऐसा ही होता है एक छोटा सा खुशनुमा दिन शुरू हुआ नहीं कि जल्दी ही अंधियारी सुनसान रात उसकी जगह ले लेती है बिल्कुल मेरी कहानी की तरह खैररररर घर पहुंच मैं अपनी मां से मिला आज पूरे : महीने बाद मैं घर आया था घर पर मां और भाई मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे तो सबसे पहले हमने साथ मिलकर खाना खाया ,इस बार घर बहुत अच्छा लग रहा था क्योंकि भाई की नयी नयी नौकरी जो लगी थी तो शायद वर्षों तक खुशियां की आश लगाते बुढ़ी हो चुकी इन घर की आंखो में जैसे एकबार फिर जवानी की चमक आनी शुरू हो गई थी अब बस एक ही समस्या थी और वो यह कि भाई की उम्र बहुत ज्यादा हो गई थी और उनके शारीरिक अभाव के कारण उनकी शादी नहीं हो पा रही थी ,जब भाई की नौकरी लगी तो एक उम्मीद जगी की हा शायद कुछ हो लेकिन इस का भी इतना कुछ असर हुआ नहीं और घर में एक समस्या फिर उत्पन्न हो गई ,मां की आंखों में तो जैसे अब बस भाई की शादी का ही सपना था ,खाना खाते हुए और फिर सोने तक वो बस बार बार इसी बारे में बात कर रही थी ,वैसे मैं इसमें कर भी क्या सकता था पर फिर भी मां को सांत्वना तो दे ही दी , अगले दिन पता नहीं क्यूं मेरी आंख जल्दी खुल गई शायद नयी जगह नींद सही से आई हो इसलिए पर एक दम से ही कुछ याद आया और पता चला कि सुबह वाला यह अलार्म तो दिल ने बजाया है बस फिर क्या था मैं भी जल्दी जल्दी उठा और हो गया मार्निंग वॉक के लिए तैयार, मां और भाई भी मुझे यूं तैआर देख अचंभित से थे और हों भी क्यूं मैं बचपन से ही बहुत आलसी था और घर पर मेरी सुबह घर में सबसे लेट होती थी मतलब मैं सबसे देरी से जगता था ,मैंने मां और भाई के अचरज की ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया क्युकी शायद मेरा ध्यान तो कहीं ओर ही था,मैंने घड़ी में टाइम देखा तो अभी सुबह के साढ़े पांच बज रहे थे हां माना सर्दियों के हिसाब से यह बहुत जल्दी है पर क्या करें यार दिल मौसम देखता है और ही समय तो बस फिर क्या मैं निकल गया उसी अंधेरे में पार्क की ओर ,वैसे तो मेरे घर से पार्क की दुरी पैदल पैदल करीब दस मिनट की थी पर आज मैं बस पांच मिनट में ही पार्क के गेट पर जा खड़ा हुआ ,अभी थोडा अंधेरा था तो भीड़ भी बहुत कम थी,मैं घुमता तो क्या इसलिए वहीं एक बैंच पर बैठ गया और खो गया कल रात हुए एक लुभावने अहसास में ,जैसे जैसे उजाला बढ़ता गया पार्क में भीड़ भी बढ़ती गई पर मुझे भीड़ से क्या करना था मुझे तो बस उसका इंतजार था जैसे ही छः बजे मेरी दिल की धड़कनें कुछ अजीब तरह से धड़कने लगीं पर यह अहसास ज्यादा समय नहीं रहा ,साढ़े छः बजने को थे और वो नहीं आई पर फिर भी मैं किसी जिद्दी आशिक की तरह वहीं जमा रहा , धीरेधीरे टाइम बढ़ा और सात बजने वाले थे आखिरकार मैं हार मान घर जाने के लिए पार्क से निकलने लगा पर जैसे ही पार्क के गेट तक पहुंचा वो सामने से आते हुए दिखी और तब जाना की बड़े बुजुर्गो ने सही ही बोला है कि सब्र का फल मीठा होता है खैर मैंने सब्र कर लिया था और अब मेरे हिस्से का मीठा फल मेरे सामने था ,मैं फिर उसकी ओर पागलों जैसे देखने लगा मतलब अगर कोई अंजान भी मुझे उसे इस तरह घुरते हुए देखता तो आसानी से अंदाजा लगा सकता था कि मेरे दिल में उसके लिए क्या हैं पर पता नहीं उसे यह पता लगा होगा भी कि नहीं ,वो दूर से ही मुझे देख कर जान गरी और वही से हाथ हिला कर अभिवादन किया पर मैं तो जैसे स्तब्ध खड़ा था बिना किसी प्रतिक्रिया के ,वो पास आयी और टोकते हुए बोलीहैलो ,पहचान गये मुझेउसकी वो तीखी आवाज सुन मेरी ध्यान मुद्रा खत्म हुई और फिर शुरू हुई हमारी बातें ,वो अकेली ही आई थी ,कल सफर में थोड़ा थक गयी  थी तो आने में थोड़ा लेट हो गई थी बाकी वो रोज छः बजे ही आती थी और कल से इसी समय पर आएंगी, उससे बाते करते हुए पता नहीं कब एक घंटा बीत गया और घड़ी में आठ बज चुके थे और अब वो घर जाने लगी और फिर वही दूर होने की उदासी पर हां आज की इस मुलाकात ने हम दोनों को और करीब ला दिया था ,उसके जाने के बाद मैं घर आया देखा तो मां और भाई मेरी ही प्रतीक्षा कर रहे थे पर मैंने घर कोई बहाना बना दिया , धीरेधीरे समय बीता ,मैं सात दिनों के लिए घर आया था और आज मुझे आये हुए पूरे नौ दिन हो चुके थे ,रात को मामाजी का फोन आया और बहुत डांट पड़ी ,जैसा कि मैं पहले ही बता चुका हूं कि मेरे मामाजी बहुत सिद्धांतवादी थे और मेरी पढ़ाई को लेकर बहुत फिक्रमंद भी थे ,उनका चिंतित होना भी सही था क्योंकि मेरी स्नातक की डिग्री पूरी हो चुकी थी और मैं अब सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था तो इस समय मेरा अपनी शिक्षा को यूं अनदेखा करना बिल्कुल भी सही नहीं था ,तो मामाजी ने मुझे कल के कल ही वापिस आने का आदेश सुना दिया और मामाजी का आदेश मैंने कभी नहीं टाला था सो मैंने कल वापिस जाने का निश्चय कर लिया ,अगली  सुबह मैं रोज की तरह छः बजे से पहले ही पार्क पहुंच गया और इंतजार करने लगा और आज वो भी पार्क समय से पहले ही गयी थी शायद उससे मिलने का जो उत्साह मेरे अंदर था वो अब कहीं कहीं उसके मन में भी उठने लगा था खैर वो आयी और हमने साथ में बातें करते हुए घुमने लगे ,आज सोचा कि जाने से पहले में उससे अपने दिल की बात जरूर कह दुंगा पर फिर लगा कि शायद यह जल्दबाजी होगी और इसी उधेड़बुन में कब समय निकल गया पता ही नहीं लगा ,जाने से पहले मैंने उसे अपने वापस जयपुर जाने के विषय में बताया ,जिस बात को बताने से पहले मैं शाय़द जिस उधेड़बुन में था उस बात के कहने के बाद मैं अपने प्यार के लिए आश्वस्त हो गया ,हां जब मैंने उसे अपने जाने की बात बताई तो उसके चेहरे पर एक उदासी छा गई ,मैं खुश था इसलिए नहीं कि वो उदास थी बल्कि इसलिए कि वो मेरे दूर जाने के डर से उदास थी ,और इसकी इस उदासी ने मेरे हर उस प्रश्न का उत्तर दे दिया जो बीते कुछ समय से बार बार मेरे मस्तिष्क के इर्दगिर्द घूम रहा था , हां इसकी इस उदासी में प्यार था जिसे मैं पढ़ सकता था ,भला अपने प्यार की उदासी मैं कैसे सहन कर सकता था तो प्रेम के वशीभूत हो मैने भी उसे वचन दे दिया कि मै हर शनिवार को अलवर जाया करूंगा और मेरे इस वादे ने उसके होंठों पर जो हंसी दी थी वो शायद मेरे पहले प्यार की पहली पहल थी ,पर अभी ये प्यार आंतरिक था तो हमें बिछड़ना तो एक दोस्त की तरह ही पड़ा,भारी मन से हमने एक दुजे को बाय कहा और मैं अपने घर गया ,सुबह दस बजे की ट्रेन थी तो जल्दी से सामान बांध मैं तैयार हुआ और खाना खाकर मां और भाई से विदा ले स्टेशन पर गया और जैसे ही मेरे सामने पटरियों पर ट्रेन रुकीं तो वो एक बार फिर मेरे स्मृति पटल पर छा गई, उसके बारे में सोचते हुए मैं जयपुर पहुंच गया और अब वहां घर पहुंच पहले तो मामाजी से थोड़ी डांट सुनी और फिर कमरे जा इंतजार करने लगा अगले शनिवार का,आज सोमवार था और अभी शनिवार दूर था पर क्या करें समय को कौन नियंत्रित कर सकता है और हां सचमुच इस शनिवार के इंतज़ार ने मुझे ये बात अच्छे से सीखा दी थी,हां पर इस बार दिल में मैं एक बात ठान चुका था इस बार जो कुछ भी हो मैं उसे अपना प्यार बता कर ही रहुंगा ,पर मैं शनिवार को वहां जाउंगा कैसे और मामाजी के पास क्या बहाना लगाऊंगा,तो कैसे कैसे गुरुवार तक सब्र किया और शायद तब तक भगवान ने मेरी मनोकामना सुन ली, उस दिन मामाजी ने एक अच्छी खबर सुना दी की शनिवार को भाई को देखने के लिए लड़की वाले रहे हैं तो मामाजी शुक्रवार शाम को अलवर जाएंगे तो मैंने भी उनके साथ चलने के लिए बोला , ख़ुशी की बात थी तो मामाजी मान गए और मानते भी कैसे नहीं बहुत समय बाद भाई को देखने के लिए कोई लड़की वाले रहे हैं और लड़की के पिता मामाजी के खास दोस्त के रिश्तेदार ही थे और फिर लड़की भी शारीरिक रुप से थोड़ी दिव्यांग थी और मामाजी पूरी तरह आश्वस्त थे कि ये रिश्ता हो ही जाएगा ,तो किसी तरह एक दिन और संयम रखा और शुक्रवार की रात तक हम घर पहुंच गये , पहुंचते हुए देर हो गई तो मैं खाना खा सोने चला गया हालांकि नींद अभी आंखों से कोसों दूर थी पर फिर भी जबरदस्ती हो गया कि कहीं कल जगने में लेट हो जाऊं पर मैं सुबह सही समय पर जग गया और जल्दी तैयार हो मार्निंग वॉक के लिए जाने लगा तो मामाजी ने देख लिया , उनकी वो प्रश्नवाचक दृष्टि मैं पढ़ सकता था और शायद मां भी इसलिए वो तुरंत बोल उठी की टहलने जा रहा है ,मैं मामला बिगड़ता देख तुरंत वहां से भाग आया , रास्ते में जाते हुए जोशी अंकल का घर दिखा और घर से ज्यादा उनके घर के आंगन में उग रहा गुलाब का पौधा दिखा ,यूं तो मैं हमेशा उस घर के दूर से होकर गुजरता था क्योंकि उस घर मैं पालतू कुत्ता रहता था और मुझे कुत्तों से बहुत डर लगता था पर फिर भी आज पता नहीं कैसे इतनी हिम्मत कर मैं एक गुलाब तोड़ ही लाया और चल पड़ा पार्क की ओर और वहां जाकर देखा तो वो आज मुझसे पहले वहा मौजूद थीं उसी बैंच पर जहां कभी मैं प्रेम अग्नि में तपता हुआ उसकी प्रतीक्षा करता था ,

आज उसकी इस प्रतीक्षा ने यह साबित कर दिया कि जिस प्रेम की वर्षा में मेरा अंग अंग गीला हो चुका है उस वर्षा के जल से अछुती वो भी नहीं है मैं उसके पास गया और जाकर उसे हाय बोला पर आज वो स्तब्ध ही मुझे निहार रही थी ,मैंने एक बार फिर हाय बोल कर उसका ध्यान भंग किया ,उसने मेरे हाथ में गुलाब देख लिया था और मैने भी सोचा कि हां यह ही सही मौका है उससे अपने दिल की बात कहने का पर फिर पता नहीं मैं क्यूं कहतेकहते रुक गया पता नहीं क्यूं पर मन में एक अजीब सा डर था और एक अहसास था कि शायद यह थोड़ी जल्दबाजी है और मैं उससे नहीं कह पाया ,हम घुमते हुए बात करने लगे वो बार बार मुझसे उस गुलाब के बारे मैं पूछ रही थी और मैं हर बार बात टाल देता ,आज फिर समय जल्दी बीत गया और वो जाने लगी,जाने से पहले उसने एक बार फिर उस गुलाब के बारे में पुछा और मैं कुछ नहीं बोला वो जाने के लिए मुड़ने लगी तो पता नहीं क्यूं कुछ अजीब हुआ मेरे साथ और मैने गुलाब उसके सामने रख उससे अपने दिल की बात कह दी,

मैं बस एक सांस मे सब कुछ कह गया ,और वो बस मुस्करा रही थी मैंने उसकी ओर आशा से देखा और उसका ज़बाब जानना चाहा तो उसने बोलामैं कल सोचकर बताउंगीऔर वो चली गई , मुझे समझ नहीं आया कि उसने कुछ ज़बाब क्यूं नहीं दिया जबकि उसकी आंखें और होंठों की मुस्कुराहट बेबाक हो उसके प्यार का इजहार कर चुकी थी पर शायद वो भी कहने में हिचकिचा रही हो पर कोई बात नहीं मैं पूरी तरह आश्वस्त था कि उसका ज़बाब क्या होगा तो मैं घर लौट आया , जल्दी नहा धोकर तैयार हुआ ,मां आज बहुत खुश थी और जल्दी जल्दी सब तैयारियां कर ली थी,आज बहुत समय बाद मैंने मां को इतना खुश देखा था और इस खुशी के लिए मैं अपनी सारी खुशियां छोड़ने के लिए तैयार था ,वो लोग तय समय पर गये ,सारी बात हो गई , वो लोग लड़की को और अपनी छोटी बेटी के साथ आये थे ,तो लड़का लड़की भी एक दुजे से मिल लिए सब बातचीत के बाद उन लोगों ने शाम को अपना निर्णय बताने के लिए कहा ,हम सब बहुत खुश थे खासकर भाई क्यूंकि हम लड़की वालों की प्रतिक्रिया से आश्वस्त थे कि ये रिश्ता पक्का है , मैं शाम को बाजार कुछ सामान लेने चला गया और जब वापिस लौटा तो देखा कि घर पर सब खुश थे तो मैं समझ गया कि उनका फोन आया होगा कि तभी मामाजी ने मुझे अपने पास बुलाया और बोले किधीरज लड़की वालों ने रिश्ते के लिए हां कर दी हैयह सुन मैं बहुत खुश हुआ और सोचा कि भाई की शादी के बाद मैं अपने बारे मे भी सबको बता दुंगा ,लेकिन इसकी अगली पंक्ति में मामाजी ने जो कहा उसने जैसे एक साथ मेरी सभी उम्मीदों को खत्म कर दिया था ,वो वोले की लड़की वाले गरीब परिवार से हैं और वो अपनी दोनों बेटियों कि शादी एक साथ ही करेंगे इसलिए उन्होंने अपनी छोटी बेटी के लिए तुम्हारा हाथ मांगा था और हमने खुशीखुशी हां कर दिया ,और ये सब सुन मैं जैसे स्तब्ध हो गया था समझ नहीं रहा था कि क्या करु या तो मामाजी की बात मान अपने भाई और मां की खुशीयों में शामिल हो जाऊं या फिर इस रिश्ते के लिए मना कर अपने अधुरे पहले प्यार को पूरा कर लूं , आखिर ये कैसी परिस्थितिया थी मेरे सामने की कर जो प्यार एक आकार ग्रहण करने जा रहा था उससे एक रात पहले ही वो ख़त्म होता दिख रहा है खैर मैं मामाजी के सामने कुछ नहीं बोल सकता और मैं कुछ बोलने की हालत में था भी नहीं मैं चुपचाप जा अपने कमरे में बेड पर लेट गया और सोचने लगा अपने कल के निर्णय के बारे मैं जिस पर मेरी ज़िंदगी टिकी थी ,एक तरफ यदि मैं इस रिश्ते के लिए मना करता हूं तो शायद भाई की शादी हो क्यूंकि ये रिश्ता बहुत मुश्किल से मिला था और दुसरी और यदि मैं इसके लिए हां करता हूं तो अपने प्यार को हमेशा के लिए त्याग दुंगा और इसी उधेड़बुन में मैं पूरी रात सो नहीं पाया और सुबह छः बजे मैं तैयार हो मामाजी के साथ स्टेशन गया जयपुर जाने के लिए , हां छोड़ दिया मैंने अपना प्यार जिसे पूरा होने में बस एक हां की जरूरत थी आज आज फिर एक जिम्मेदारी के कारण मैं अपना इश्क अधुरा छोड़ आया गैर जिम्मेदार आशिक जैसे और यह सब सोचते हुए कब अलवर गया पता ही नहीं चला और मैं उस घटना के दस साल बाद अपने वर्तमान में आया, यूं तो शादी हो चुकी है मेरी और हां अपनी पत्नी के प्रति बहुत समर्पित और वफादार भी हूं मैं पर पता नहीं आज भी ट्रेन का वो डिब्बा मुझे हर रिश्ते से वेबफा बना देता है और वो रिश्ता है उसकी यादों का ,उसके अनकहे प्यार का जो आज भी जीवित हैं मेरे हर ट्रेन के सफर में ,आज भी किसी सफर में जब वो याद आती है तो कानों में उसकी वो तीखी आवाज गुंजती है और होंठों पर एक मुस्कान जाती है , अच्छा इतना सब उसके बारे में बताया पर उसका नाम तो बताया ही नहीं मैंने ,  “मुस्काननाम था उसका

तो दोस्तो यह थी धीरज की जिम्मेदारी और इश्क के बीच कशमकश की कहानी जिसे खुद साझा किया है हमसे धीरज ने और इसे हमने अपने फिल्मी शब्दों के माध्यम से आपके सामने प्रस्तुत किया है तो दोस्तों यदि आपकी भी पहले प्यार की अधुरी कहानी है तो उसे हमारे साथ साझा करें जिसे हम आपके वास्तविक नाम के साथ और हमारे शब्दों में पोस्ट करेंगे

और हां कहानी पर कमेंट करके हमें जरूर बताएं कि धीरज ने जो किया वो सही था या ग़लत??????

धन्यवाद 🙏


Translation coming soon.

By – आधुनिक कालिदास

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